आये दिन हम खबरों में बलात्कार की खबरें पढ़ते रहते हैं, जिसमें यत्र तत्र जबरन यौन संसर्गों की खबरें सामने आती हैं। भारत में हर रोज़ कम से कम 50 बलात्कार के मामले पंजीकृत होते हैं। कभी ये खबरें बड़ी खबर हुआ करती थीं, लोग रोष से भर जाते थे। मगर अब इन अपराधों की अधिकता इतनी हो गई है एक बलात्कार की खबर आम बात सी लगती है। समय के साथ एक बदलाव और आया है कि बलात्कार अब सिर्फ महिलाओं के साथ ही नहीं, बल्कि पशुओं, छोटे बच्चों व तृतीय लिंगों के साथ भी होना शुरू हो गए हैं। अधिकतर मामले अब बलात्कार तक नहीं रहे बल्कि यौन हिंसा का रूप ले चुके हैं। आइये आज जानते हैं कि बलात्कार भारत में कहाँ से शुरू हुए और क्यों होते हैं
भारत का इतिहास देखा जाए तो मूल रूप से यह देश पूर्णतः खुले विचारों वाला और आधुनिकतम देश था, जो कि न सिर्फ धन धान्य बल्कि शिक्षा व संस्कृति का अथाह भंडार हुआ करता था। कालांतर में जब भारत पर विभिन्न सभ्यताओं के आक्रमण शुरू हुए तब इस देश की संस्कृति में बदलाव आते चले गए। प्रारम्भ में जो आक्रमणकारी आये उनका उद्देश्य यहां की सम्पदा को लूटना था, मगर अरब के मुगलों के आगमन ने न सिर्फ भारत की सम्पदा को लूटने का काम किया बल्कि स्त्रियों को भी साथ ले जाने के अत्याचार शुरू किये , पहली बार बलात्कार जैसे यौन अत्याचार इसी काल में शुरू हुए। सेक्स स्लेव जैसे कुकृत्य अंजाम दिए जाने लगे। परिणाम यह हुआ कि रक्षा के लिए स्त्रियों को ढंकने की प्रथाएं जो सिर्फ अरब में हुआ करती थी वो भारत में भी शुरू हो गई। कम उम्र में लड़कियों का विवाह किया जाना शुरू हो गए ताकि वर्जिन होने के कारण अपहरण और विक्रय से बचा जा सके। अकेलेपन में अत्याचार से बचने के लिए महिलाओं ने सती होना शुरू कर दिया और सती प्रथा शुरू हो गई। यहां की संस्कृति आक्रमणकारियों ने पूरी तरह बदल दी थी , जो देश कामसूत्र और खजुराहो , अजंता ऐलोरा का जनक माना जाता था वहीं सेक्स एक गोपनीय और आपराधिक भाव माना जाने लगा। जिसका परिणाम आज हम घातक रूप में देख रहे हैं, हालांकि मध्यकाल के परिवर्तनों ने महिलाओं को अधिक रक्षात्मक बना दिया था , स्त्रियों का घर से निकलना भी बंद हो गया था। ऐसे में बलात्कारों के प्रसंग इतने नहीं मिलते थे। मगर वर्तमान में जिस वीभत्स तरह से बलात्कार हो रहे हैं, वह उसी दौर की याद दिलाते हैं। दिल्ली गैंगरेप के उदाहरण में हमने जाना कि एक अल्पवयस्क अफ़रोज़ भी महिलाओं के प्रति इतना क्रूर हो सकता है।
हालंकि सभी बलात्कारों का एक ही कारण नहीं हो सकता फिर भी एक कारण सभी प्रकार के बलात्कारों में होता है, वह है स्त्रियों के प्रति एक सा नज़रिया, आप गौर कीजिये कि बलात्कार के अधिकतर मामले उन्हीं राज्यों में मिलते हैं जिसमें पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था है, और पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था उन राज्यों में ज्यादा है जो गुलामी के प्रभाव में ज्यादा रहे हैं। यहां पुरुषों को यही सिखाया जाता है कि मर्द बनो, अगर आँख से आंसू भी आजाये तो यह मर्दानगी पर दाग है। दरअसल सारा दोष यही है कि आधुनिक अभिवावक अपने बेटों को संवेदनाओं से परिचित होने ही नहीं देते। कठोर होने का वह पाठ उन्हें पढ़ाया जाता है कि वे स्त्रियों को कमज़ोर और खुद पर आश्रित समझने लगते हैं। वे सिर्फ यह समझते हैं कि स्त्री उनकी अतृप्त यौन इच्छाओं की पूर्ती हेतु वस्तु मात्र है। वहीं नॉर्थईस्ट के महिलाप्रधान प्रदेशों में बलात्कार काफी कम हैं।
पूर्व के कड़वे अनुभवों के कारण समाज ने सेक्स की सही जानकारी तो दूर सेक्स को इतना गोपनीय विषय बना दिया गया कि लोग इसे अपराध मानने लगे, जिसे करने का कौतूहल सबसे अधिक बलवान होता है और यही दमन विस्फोटक हो गया, हम अपने बच्चों को सही ज्ञान नहीं दे पाते। ना ही उन्हें उतना खुला माहौल दे पाते हैं जिसमें वे अपनी जिज्ञासाएं सबके सामने रख सकें। गौर कीजिए अब बलात्कार सम्बन्धियों में ही ज्यादा हो रहा है। जो कि प्रकाश में आ ही नहीं पाता। इसका यही कारण है कि समाज में हद से ज्यादा परदा हो रहा है, ना ही स्त्रियां इतनी मुखर हो पाती हैं कि पुरुष उनसे भय खाए और ना ही अपनी बात को सभी से रख पाने की उन्हें आज़ादी दी जा रही है। पीड़ित स्त्री को सब चारित्रिक अपराधी की नज़र से देखते हैं। और रेप करने वाला साफ़ निकल जाता है। इससे बलात्कारियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं, जिसके कारण एक बार बलात्कार की शिकार महिला सालों तक यौन उत्पीड़न सहने के लिए खुद को मज़बूर समझती है।
इसके अलावा लचर क़ानून व्यवस्था भी एक बड़ा कारण है, एक ही व्यक्ति निरंतर बलात्कार करता रहता है और क़ानून उसे रोक पाने में असमर्थ होता है, वहीं देर से न्याय इस में घी की तरह काम करता है। सच तो यह है कि बलात्कारियों को अब भय भी नहीं लगता।
पोर्न की सहज उपलब्धता जहां बचपन से ही बलात्कार करने की भावनाओं को विस्फोटित करती हैं वहीं मीडिया द्वारा बलात्कार का शब्द-शब्द वर्णन अन्य नवअपराधियों को बलात्कार करने के तरीके सिखाता है।
जब तक स्त्रियों के दिमाग में यह बैठा रहेगा कि वे पुरुष पर आश्रित हैं, तब तक ये क्रम नहीं रुक सकता, जिस दिन महिलाओं को ये समझ आ गया कि कि वे पुरुषों के बिना भी रह सकती हैं, उस दिन ये मानसिकता भी बदल जायेगी और हालात भी। उस दिन वे यौन हिंसा तो क्या छेड़खानी तक का विरोध पूरे आत्म विश्वास के साथ करना शुरू कर देंगी। साथ ही समाज को भी इसमें पूरा सहयोग देना पड़ेगा, यौन अपराधों में स्त्री के चरित्र को दूषित मानने के बजाए दोषी को चरित्रहीन कह कर बहिष्कार करना आवश्यक होना चाहिए। साथ ही क़ानून में सख्ती और तेज़ी परम आवश्यक है।
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